योग और आयुर्वेद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो मिलकर मनुष्य को पूर्ण स्वास्थ्य, दीर्घायु और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं। दोनों ही विधाओं की उत्पत्ति भारत के वैदिक काल में हुई थी। जहाँ आयुर्वेद को 'जीवन का विज्ञान' कहा जाता है और यह मुख्य रूप से आहार, जड़ी-बूटियों व जीवनशैली के माध्यम से शरीर को ठीक रखने पर ध्यान केंद्रित करता है; वहीं योग को 'आत्मा का विज्ञान' कहा जाता है जो मन और चेतना के अनुशासन पर काम करता है। ये दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
आयुर्वेद के अनुसार, हर मनुष्य का शरीर तीन दोषों—वात, पित्त और कफ से मिलकर बना है। जब इन तीनों में असंतुलन होता है, तो शरीर में बीमारियां पैदा होती हैं। योग इन दोषों को संतुलित करने का सबसे व्यावहारिक तरीका है। उदाहरण के लिए, जिन लोगों के शरीर में 'वात' (वायु) दोष बढ़ा हुआ होता है, उनका मन अशांत रहता है और जोड़ों में दर्द होता है; उनके लिए धीमे और स्थिरता वाले आसन जैसे पश्चिमोत्तानासन या शवासन बहुत लाभकारी होते हैं। 'पित्त' (अग्नि) दोष वाले लोगों को शांत और ठंडे करने वाले प्राणायाम जैसे शीतली या चंद्रभेदी प्राणायाम करने की सलाह दी जाती है। 'कफ' (पृथ्वी और जल) दोष के व्यक्तियों को सक्रिय और पसीना बहाने वाले आसन जैसे सूर्यनमस्कार और कपालभाति करने चाहिए।
जब कोई व्यक्ति आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार सात्विक भोजन (ताजा, शाकाहारी और सुपाच्य भोजन) करता है और साथ में नियमित योग का अभ्यास करता है, तो उसके शरीर की 'अग्नि' (पाचन तंत्र) मजबूत होती है और 'आमा' (विषाक्त पदार्थ) का निर्माण रुक जाता है। यह जुगलबंदी केवल रोगों का इलाज नहीं करती, बल्कि रोगों को पैदा ही नहीं होने देती। आधुनिक युग में पूर्ण कल्याण (Holistic Wellness) पाने का यह सबसे प्रामाणिक मार्ग है।